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जंजीर

बाबुल मोहे राजा घर ना दीजो ,
मोहे राज- पाढ़ ना भाये...
बाबुल मोहे ज़मींदार घर भी ना दीजो ,
मोहे धन- धान्य ना भाये ...
बाबुल मोहे सुनार घर भी  ना दीजो, 
मोहे जेवर- जवाहरात ना भाये ...
बाबुल मोहे लोहार घर ही दीजो, 
जो मोरी जंजीर पिघलाए ...
मन के पिजरे में लगे,
मोरे ताले  तुडाये …
पिंजरे से निकल उड़ चलु,
मै भी उस नील गगन की ओर ,
सुना बहुत है बारे में जिस के,
पर जंजीर तले देख जिसे ना पाई कभी ...   
बाबुल मोहे लोहार घर ही दीजो, 
जो मोरी जंजीर पिघलाए…मोरी जंजीर पिघलाए...  ...

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