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घरोंदे की चिड़िया

घरोंदे से बहार निकली उस चिड़िया को, 
ना जाने क्यों हर कोई, बस दबोचना ही चाहता है ...
वो पंख पसार के उड़ना चाहे,
तो ना जाने क्यों हर कोई, उसके पंखो को बस काटना ही चाहता है ... 
वो आसमान की ऊचाइया छू कर भी, आज़ाद नहीं है ,
उसको ना जाने क्यों हर कोई, बस ये जताना ही चाहता है ... 
एक माँ की ममता, एक बिटिया की चंचलता  ...
एक बहिन की मुस्कुराहट, एक पत्नी का प्यार ...
सब कुछ भुला कर, जब सड़को पे बड़ी बेरहमी 
से उसको घसीटा जाता है ,
उसके तन और मन के जर्जर होने के बाद, 
जब उसको सब कुछ भुला देने  को कहा जाता है, 
तो ना जाने क्यों, इस संसार से मेरा ये मन 
उकता सा जाता है ...
घरोंदे से बहार निकली उस चिड़िया को ,
ना जाने क्यों हर कोई बस दबोचना ही चाहता है ... 

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